चंदा के नाम पर धंधा… 200 रुपये का दान, शिक्षित भ्रष्टाचार की पहचान

₹200 Donation in Schools : चंदा के नाम पर 200 रुपये का दान और शिक्षित भ्रष्टाचार पर बड़ा सवाल। शिक्षा व्यवस्था में चंदे की आड़ में वसूली की संस्कृति और जिम्मेदारी पर पढ़िए कटाक्ष।
कोरबा। एक समय था, जब शिक्षा को केवल अक्षर ज्ञान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण की पहली सीढ़ी माना जाता था। माना जाता था कि पढ़ा-लिखा आदमी विवेकशील होगा, संस्कारवान होगा और गलत-सही के बीच फर्क करने की समझ रखेगा। लेकिन समय ने शायद शिक्षा का अर्थ थोड़ा बदल दिया है।
अब प्रश्न यह नहीं रह गया कि शिक्षा ने इंसान को कितना ईमानदार बनाया, बल्कि सवाल यह है कि कहीं शिक्षा ने बेईमानी के तौर-तरीकों को ही अधिक व्यवस्थित और शिक्षित तो नहीं कर दिया?
सरकारी दफ्तरों में सुविधा शुल्क से लेकर सहयोग राशि तक, नाम बदलते रहे, चलन वही रहा। अब शिक्षा की अलख जगाने वाले विभाग पर ही ‘चंदा’ वसूली के आरोप सवाल खड़े कर रहे हैं।
कोरबा में जिले के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों के करीब 5 हजार शिक्षकों से 200-200 रुपये, यानी लगभग 10 लाख रुपये, ‘शिक्षा दान’ के नाम पर लिए जाने की बात सामने आई है। सवाल रकम से ज्यादा व्यवस्था का है। राशि किसके आदेश पर ली जा रही है? उद्देश्य क्या है? क्या यह वास्तव में स्वैच्छिक है? और यदि है तो इसका हिसाब कहां है?
कोरबा का जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय पहले भी आरटीई भुगतान, स्थानांतरण और अटैचमेंट जैसे विषयों को लेकर चर्चाओं में रहा है। अब ‘शिक्षा दान’ का यह नया प्रसंग उन चर्चाओं में एक और अध्याय जोड़ रहा है।
विडंबना यही है कि जिस विभाग से बच्चों को ईमानदारी और नैतिकता का पाठ पढ़ाने की उम्मीद की जाती है, उसी के नाम पर यदि चंदा वसूली के आरोप लगें तो जवाब भी साफ होना चाहिए। विभाग की वसूली पर शिक्षाविद् फिल्म गोलमाल का बैक ग्राउंड म्यूजिक ” सीधे रस्ते की एक टेढ़ी चाल है,गोल माल है भई सब गोल माल है…” को गुनगुना रहे है।



