छत्तीसगढ़ के कोरबा में कोयला खनन का असर, प्रदूषण से लेकर विस्थापन तक इन समस्याओं से जूझ रहे स्थानीय लोग

कोरबा। छत्तीसगढ़ का कोरबा कोयला उत्पादन और बिजली निर्माण के लिए देशभर में जाना जाता है। जिले में बड़े पैमाने पर कोयला खनन और थर्मल पावर प्लांट संचालित हैं, लेकिन औद्योगिक गतिविधियों के साथ प्रदूषण और विस्थापन की समस्या भी सामने आती रही है। कोयला खदानों के आसपास रहने वाले लोगों के लिए धूल, धुआं और राख रोजमर्रा की परेशानी का हिस्सा बन चुके हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, शहर और आसपास के कई इलाकों में हवा में धूल की मात्रा इतनी महसूस होती है कि थोड़ी देर में ही घरों और दूसरी सतहों पर इसकी परत जम जाती है।
कोरबा में सिर्फ प्रदूषण ही नहीं, बल्कि खनन परियोजनाओं के विस्तार से प्रभावित गांवों और परिवारों का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है। पाली गांव की करीब 1,500 की आबादी पर भी खनन विस्तार का असर पड़ने की बात सामने आई है। कुसमुंडा परियोजना के लिए कई गांवों की जमीन पहले ही अधिग्रहित की जा चुकी है। कुछ परिवारों के सामने मुआवजा, पुनर्वास और रोजगार से जुड़े मामलों के समाधान का इंतजार भी है।
फ्लाई ऐश से बढ़ी प्रदूषण की चुनौती
कोरबा के थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली फ्लाई ऐश पर्यावरण को लेकर सबसे बड़ी चिंताओं में शामिल है। स्थानीय पर्यावरण कार्यकर्ता मनीष राठौर के मुताबिक, कोयले में बड़ी मात्रा में राख होती है और बिजली उत्पादन के दौरान भारी मात्रा में फ्लाई ऐश निकलती है। उनका कहना है कि नियमों के तहत राख के उपयोग और प्रबंधन की व्यवस्था है, लेकिन जमीनी स्तर पर इसके पालन को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
सड़क, खेत और जलस्रोतों तक पहुंच रही राख
रिपोर्ट में बताया गया है कि कई जगहों पर फ्लाई ऐश और राखड़ को खुले स्थानों, खेतों तथा तालाबों के आसपास डंप किए जाने की शिकायतें सामने आई हैं। हवा चलने पर राख के महीन कण आसपास के इलाकों में फैल सकते हैं। वहीं, राखड़ के निस्तारण से जुड़े स्थानों से पानी के रिसाव को लेकर भूजल प्रभावित होने की आशंका भी व्यक्त की गई है।
प्रदूषण और स्वास्थ्य को लेकर सामने आई रिपोर्ट
कोरबा में प्रदूषण के स्वास्थ्य पर असर को लेकर पहले भी अध्ययन किए जा चुके हैं। 2020 की स्टेट हेल्थ रिसोर्स सेंटर की रिपोर्ट में थर्मल पावर स्टेशनों के आसपास रहने वाले समुदायों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन किया गया था। अध्ययन के दौरान अलग-अलग औद्योगिक क्षेत्रों में पानी और मिट्टी के नमूने लिए गए, जबकि कई स्थानों पर हवा की गुणवत्ता की भी जांच की गई। कुछ जगहों पर PM2.5 का स्तर निर्धारित सीमा से अधिक पाया गया था।
खनन क्षेत्र के करीब बसे लोगों की बढ़ी मुश्किलें
पाली और आसपास के इलाकों में रहने वाले लोगों ने खनन गतिविधियों के कारण धूल, भारी वाहनों की आवाजाही और ब्लास्टिंग जैसी समस्याओं का जिक्र किया है। स्थानीय निवासी ब्रजेश श्रीवास ने बताया कि क्षेत्र में भूजल स्तर में बदलाव और कुओं के सूखने जैसी स्थिति भी देखी गई है। खेती पर असर पड़ने और गांव के कुछ हिस्सों में मकानों के हटाए जाने की बात भी रिपोर्ट में सामने आई है।
विस्थापन और मुआवजे का सवाल भी बरकरार
खनन क्षेत्र के नजदीक रहने वाले कुछ परिवारों के सामने पुनर्वास और मुआवजे से जुड़े मामलों का समाधान अभी महत्वपूर्ण मुद्दा बना हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, कुछ गांवों में जमीन अधिग्रहण के बावजूद परिवारों के पुनर्वास, मुआवजे और रोजगार से जुड़े मामलों पर बातचीत चल रही थी। इस बीच खदानों से निकलने वाली धूल और वाहनों की आवाजाही का असर स्थानीय लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी पर पड़ रहा है।



